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(विचार मंथन) आतंक का सफाया 

(लेखक-सिद्धार्थ शंकर)

जम्मू कश्मीर में आतंक का सफाया शतक पार कर गया है। 2022 के शुरुआती 5 महीनों और 12 दिन के अंदर पुलिस और सेना ने 100 आतंकी मार गिराए। इस साल अब तक घाटी के अलग-अलग इलाकों में हुई मुठभेड़ों में 71 स्थानीय और 29 विदेशी आतंकवादियों को मार गिराया गया है। सेना और पुलिस ने मिलकर आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के 63 और जैश-ए-मोहम्मद के 24 आतंकी मार गिराए। जानकारी के मुताबिक इस साल कुल 61 एनकाउंटर हुए। इनमें 47 आतंकियों और उनके 185 मददगारों को गिरफ्तार किया गया। वहीं इन मुठभेड़ों में 17 आम नागरिकों और 16 पुलिस और सेना के जवानों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। पिछले साल इसी टाइम लिमिट में आतंकियों के मारने का आंकड़ा 50 तक ही पहुंच सका था। इनमें 49 लोकल टेररिस्ट और 1 विदेशी आतंकी शामिल था। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा आदिल पारे के एनकाउंटर के बाद सैकड़ा पूरा हुआ। आदिल जम्मू-कश्मीर में दो पुलिस कर्मियों की हत्या में शामिल था। श्रीनगर के क्रिसबल पालपोरा संगम इलाके में आतंकवादियों और श्रीनगर पुलिस की एक छोटी टीम के साथ एक मुठभेड़ शुरू हुई। लश्कर का यह आतंकी जम्मू कश्मीर पुलिस दो जवानों हसन डार की हत्या और अंचार सौरा में सैफुल्लाह कादरी की हत्या में शामिल था। इसने 9 साल की लड़की को घायल भी कर दिया था। जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में आतंकवादियां का मारा जाना निश्चित रूप से एक बड़ी कामयाबी है। लेकिन इस दौरान 16 जवानों सहित 17 नागरिकों की जान चली गई और यह देश के लिए बड़ा नुकसान है। इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि आतंकवाद से पीड़ित इस राज्य में सुरक्षाबलों को आतंकवादियों का सामना करने के मामले में कामयाबी की दर बढ़ रही है। पिछले कई दशक से आतंकवाद पर काबू पाने के मकसद से की जा रही तमाम कवायदों के बावजूद आज भी कई बार आतंकी गिरोह सुरक्षा बलों पर हमले कर अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहते हैं। लेकिन यह भी सच है कि पिछले कुछ समय से खुफिया सूचनाओं के लेन-देन के मोर्चे पर अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर हुआ है और इसमें स्थानीय आबादी को भी सहयोग की भूमिका में लाने की कोशिश की गई है। इसका हासिल यह है कि आतंकवादियों के अचानक हमलों से निपटने के लिए की जाने वाली पूर्व तैयारी या रणनीति बनाने में काफी मदद मिली है। निश्चित तौर पर इससे हिज्बुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों को करारा झटका लगा है, जो पाकिस्तान की शह पाकर भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। विडंबना यह भी है कि भारत की ओर से लगातार चेतावनी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तमाम फजीहत के बावजूद पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई करने की जहमत नहीं उठाता। पिछले कुछ समय से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं या उनके परिजनों से संवाद कायम कर उन्हें आतंक के रास्ते से वापस लाने की कवायदें भी साथ चल रही हैं। इनमें कुछ मामलों में परिजनों की अपील के बाद आतंकी दस्तों से कुछ युवाओं को वापस लाने में सफलता भी मिली है। जाहिर है, सुरक्षा बलों की चौकसी और अभियानों के साथ-साथ स्थानीय आबादी को विश्वास में लेने की रणनीति आतंकवाद की समस्या के दीर्घकालिक हल का रास्ता तैयार कर सकती है।
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