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(विचार मंथन) बिजली की मांग 

(लेखक-सिद्धार्थ शंकर)

देश के कई राज्यों में जहां प्रचंड गर्मी के चलते बिजली की मांग बढ़ी है, वहीं इसकी आपूर्ति भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। देशभर में भीषण गर्मी के बीच बीत हफ्ते पीक आवर में बिजली आपूर्ति तीन बार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची।
देश में बिजली के चिंताजनक हालत के बीच गृह मंत्री अमित शाह एक्शन में आ गए हैं। उन्होंने ऊर्जा मंत्री आरके सिंह, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव व कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी के साथ उच्च स्तरीय बैठक की और संकट जल्द से जल्द दूर करने के निर्देश दिए। भीषण गर्मी के बीच दिल्ली में बिजली का संकट गहराने लगा है।
दिल्ली के कई हिस्सों में रविवार को कटौती भी की गई। हालांकि, केंद्र सरकार ने दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों से कहा है कि मांग के अनुसार विद्युत आपूर्ति की जाए। कोयले की कमी से थर्मल प्लांट जूझ रहे है। इसे लेकर बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनी भी चिंतित है।  पिछले कई दिनों से जो हालात बने हुए हैं, वे स्थिति की गंभीरता बताने के लिए काफी हैं।
इस वक्त ज्यादातर राज्य पर्याप्त बिजली नहीं मिलने की शिकायत कर रहे हैं। वैसे भी गर्मी के मौसम में बिजली की मांग बढ़ जाती है। लेकिन विडंबना यह है कि सब जानते-बूझते भी सरकारें समय रहते ऐसे मुकम्मल बंदोबस्त नहीं करतीं जिससे बिजली संकट खड़ा न हो।
सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आने दी जाती है कि दस-दस घंटे की बिजली कटौती करनी पड़ जाए। जब पता है कि गर्मी के दिनों में बिजली की मांग बढ़ेगी तो पहले ही से इसके लिए तैयारियां क्यों नहीं की जाती? ऐसा भी नहीं कि पहली बार बिजली की कमी का ऐसा संकट खड़ा हुआ है।
लेकिन दुख की बात यह है कि हमने पूर्व के संकटों से कोई सबक नहीं लिया। इसी का नतीजा है कि इस बार फिर देश के ज्यादातर हिस्से अंधेरे में डूब रहे हैं और लोगों के पसीने छूट रहे हैं। गौरतलब है कि ज्यादातर बिजलीघरों के पास पर्याप्त कोयला नहीं है। हालात कितने नाजुक हैं, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 60 फीसद बिजली संयंत्रों के पास 25 फीसद से भी कम कोयला बचा है।
हालांकि कोयला मंत्री ने बिजली संयंत्रों के पास दस दिन का कोयला होने का दावा किया है। पर हैरत की बात यह है कि एक तरफ तो बिजली संकट के लिए अब तक कोयला उत्पादन में कमी की बात कही जाती रही है, जबकि दूसरी ओर देश में कोयले की कमी नहीं होने का दावा भी सुनने को मिलता रहा है।
इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि फिर बिजली संकट क्यों खड़ा हो गया? आंकड़े बताते हैं कि कोयला उत्पादक कंपनियों के पास करीब साढ़े छह करोड़ टन कोयले का पर्याप्त भंडार है और इस बार अप्रैल में कोयला उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 27 फीसद बढ़ा है। ऐसे में अगर बिजली संयंत्रों को समय पर कोयला नहीं मिल पा रहा है तो इसका मतलब है कि समस्या का छोर कहीं और भी होगा।
बिजली संकट का मुद्दा कोयले की ढुलाई से भी जुड़ा है। कोयला कंपनियों की शिकायत रही है कि राज्य उन्हें ढुलाई का भाड़ा नहीं देते और राज्यों पर यह रकम साढ़े 15 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया है। अगर ऐसा है, तो साफ है कि यह केंद्र, राज्यों और कोयला उत्पादक कंपनियों के बीच का मसला है। पर यह कोई ऐसा जटिल मसला भी नहीं है जो सुलझाया न जा सके।
लेकिन सिर्फ ढुलाई के भाड़े को लेकर समस्या बड़ी होती जा रही है तो यह गंभीर बात है। हालांकि बिजलीघरों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलवे ने कमर कसी है, बड़ी संख्या में मालगाडिय़ां लगाई हैं और कुछ दिन के लिए सैकड़ों यात्री गाड़ियों के फेरे भी बंद कर दिए हैं, ताकि मालगाड़ियों के लिए रास्ता साफ रहे।
अगर रेलवे ऐसी ही चुस्ती पहले दिखा देता तो शायद बिजलीघर एक दिन या एक हफ्ते का कोयला बचा होने का रोना न रोते। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बिजली की कमी से कहीं ज्यादा बड़ा संकट कोयला, रेल और बिजली मंत्रालय में तालमेल की कमी का भी दिखता है।
वरना जब कंपनियों के पास कोयला भी पर्याप्त है, रेलवे के पास भरपूर संसाधन और क्षमता है और बिजली घर भी उत्पादन में पीछे नहीं हैं, तो फिर क्यों देश अंधेरे में डूबने को मजबूर है?
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