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Editorial: आपसी निपटारे की संस्कृति बनता बुलडोजर

डॉ देवेन्द्र 

अमेरिका के 34वे राष्ट्रपति ड्वाइट डेविड आइज़नहावर लिखते हैं “शांति और न्याय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
विकास और विनाश मे उपकरणों का महत्व नहीं होता केवल मंशा का महत्व होता है, साधनों का उपयोग , जब तक मानव हित में हो रहा है तब तक ही वे विकास के साधन हैं अन्यथा जिस लकड़ी से सहारा मिलता है उसी से युद्ध का आरंभ भी हो सकता है. यह बात आज के राजनीतिक जीवन काल में यथार्थ होती मालूम हो रही है,

बुलडोजर का प्रयोग मशीन के तौर पर नहीं एक दानव के रूप में किया जा रहा है जो कब किस को लील जाए कोई नही जानता.यह प्रथा समाज में एक अशांति को जन्म दे रही है जिससे आम आदमी भी कातर निगाहों से देख रहा है.

दरअसल इस मशीन का मापदंड सही और गलत नहीं ताकतवर और कमजोर है, चाहे फिर वो राजनीतिक हो, सामाजिक हो, या फिर आर्थिक. बुलडोजर का चलना आपकी पकड़ को दर्शाता है, जितने आप सक्षम है उतना समय आप बुलडोजर से सुरक्षित. सिक्के का एक दूसरा पहलू यह भी है कि बुलडोजर आपसी निपटारे का एक साधन बन गया है, सत्ताधीशों से आपके आपसी मतभेद कल आपके घर पर बुलडोजर को निमंत्रण दे सकते हैं.
भारतीय संविधान में न्यायपालिका को हमेशा ही कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से अलग रखा गया क्योंकि इसका स्वतंत्र होना बहुत जरूरी था, लेकिन अब व्यवस्थापिका का दूसरा स्तंभ (नौकरशाही) पहले (कार्यपालिका) के साथ मिलकर तीसरे (न्यायपालिका) को निगलने के लिए मुंह फाड़े खड़ा है, अब न्याय के लिए कोर्ट कचहरी की आवश्यकता शून्य मालूम होती है, फिल्मी तरीके से लोगों के मकान, दुकान ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिए जाते हैं.
लेकिन हां अगर आपके पास पूंजी है तो आप इस तमाशे को स्थगित कर सकते हैं. उत्तर प्रदेश से शुरू हुई बुलडोजर परंपरा ने अब मध्यप्रदेश में भी अपने पांव पसार लिए है, इंदौर के इंडस्ट्री हाउस के सामने अतिक्रमण तोड़ने की इस घटना ने न सिर्फ राजनीतिक चर्चा गरम कर दी बल्कि व्यापारियों के भी कान खड़े कर दिए हैं,
हर छोटा बड़ा व्यक्ति शासन और प्रशासन से अपने संबंध मजबूत रखना चाहता है, और आज के समय में इन अधिकारी व नेताओं का केवल एक भगवान है रुपया. ये रिश्तेदारी की प्रथा भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दे रही है.
हम आजादी का 75 वा आजादी महोत्सव मना रहे हैं पर अफसोस आज भी  कालजयी लेखक प्रेमचंद की वो पंक्तियां राजनीतिक पटल पर जीवंत मालूम होती है.
“न्याय और नीति सब लक्ष्मी के दो खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती है नचाती है।”

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