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मध्यप्रदेश का स्वाधीनता संग्राम और तिरंगे की शान 

लेखक-निलय श्रीवास्तव
भारतीय पौराणिक गाथाएं और इतिहास साक्षी हैं कि भारत की जन्य और भव्य पावन संस्.ति पर जब- जब प्रहार हुआ तब- तब कालजयी महामानवो ने इस धरा पर जन्म लेकर उसे प्रहार मुक्त किया है । राष्ट्रीय ध्वज किसी राष्ट्र की सम्प्रभुता, अस्मिता और गौरव का प्रतीक होता है। भारतीय स्वतंत्रता के लिए लड़ाई में चरखा युक्त तिरंगे झण्डे को यह दर्जा प्राप्त रहा है। सन्् 1923 में इस ध्वज की आन- बान-शान  को लेकर एक ऐसा प्रसंग उपस्थित हो गया जिसमें न केवल राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्पूर्ण राष्ट्र में  श्रद्धा और निष्ठा की मुखर अभिव्यक्ति हुयी, बल्कि फिरंगी हुकुमत तक को उसे मान्य करने पर विवश होना पड़ा। इतिहास के इस स्वर्णिम अध्याय को झण्डा सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में तिरंगे की शान को बरकरार रखने के लिए जान की आहुति दी गयीं। महाकौशल के नरसिंहपुर जिले में ब्रिटिश हुकुमत तिरंगे को फहराने से रोकने के लिए घेराबंदी कर रही थी इसी बीच स्वतंत्रता संग्राम के एक साहसी वीर छोटेलाल काछी ने अदालत भवन पर चढ़कर तिरंगा लहराया। ब्रिटिश हुकुमत के सिपाही इससे बौखला गए और छोटेलाल काछी पर गोलियाँ चला दीं। अपनी अंतिम सांस तक छोटेलाल काछी हाथों में तिरंगा थामे उसे लहराते रहे। उनकी वहीं शहादत हो गयी। इसी तरह शहीद मंशाराम पर जब अंग्रेज सिपाहियों ने गोली चलायीं तब उनके हाथों में देश का तिरंगा था जिसे वे शान से लहराते हुए चल रहे थे। यह दोनो प्रसंग बताते हैं कि क्रांतिकारियों को देश और तिरंगे से कितना प्रेम था। आजादी हासिल करने के लिये सम्पन्न आंदोलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाले विद्यार्थी तथा नौजवान बड़े क्रांतिकारियों की गतिविधियों से अत्याधिक प्रभावित थे। इस तरह देश का हृदयस्थल मध्यप्रदेश अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई के अंतर्गत संचालित गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बन गया था। महात्मा गांधी सहित कई बड़े नेताओं के सान्निध्य में क्रांतिकारियों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेकर अपना सच्चा देशभक्त होने का प्रमाण दिया। मध्यप्रदेश के स्वतंत्रता  संग्राम में मास्टर अब्दुल मनी, ठाकुर  रूद्रप्रताप सिंह, निरंजन सिंह, सीताराम ताटके, ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी के उल्लेखनीय योगदान को मध्यप्रदेश कभी विस्मृत नहीं कर पायेगा।
अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जिन महामनिषियों ने लड़ाई लड़कर हमें आजादी दिलायी उनका योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। मध्यप्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम की बलिवेदी पर अपनी जान न्यौछावर करने वाले शूरवीरों का जब- जब उल्लेख होगा तब- तब शहीद मंशाराम का नाम प्रमुखता से लिया जायेगा। अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ मंशाराम की लड़ाई  तब तक जारी रही जब तक कि उनके शरीर से प्राण नहीं निकल गए। 9 अगस्त सन्् 1942 के मुंबई अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित हुआ। महाकौशल के नरसिंहपुर जिले के चिचली में मंशाराम ने क्रांतिकारी युवकों को संगठित कर उन्हें आंदोलन में सर्वस्व न्यौछावर करने की प्रेरणा दी। मंशाराम ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ जुलूस निकाला। जुलूस में शामिल युवकों के हाथों में राष्ट्रीय झंडा था। जुलूस के पीछे ब्रिटिश पुलिस के जवान भी चल रहे थे। रास्ते में कुछ युवकों  की पुलिस से कहा सुनी हो गयी। 23 अगस्त को सुबह इसी जुलूस के कारण मंशाराम के दो साथी युवक बाबूलाल चौहरिया और नर्मदा प्रसाद को गिरतार कर लिया गया। इस गिरतारी के विरोध में ग्राम  में हड़ताल कर जुलूस निकाला गया। जुलूस राजमहल पहुँचा। पुलिस द्वारा गोली मार देने की धमकी के बावजूद बंदी युवकों को फूल मालाएं पहनाकर स्वागत किया गया। जुलूस जब सभा में परिवर्तित हुआ तब मंशाराम ने अंग्रेजों के विरोध में भाषण दिया। भाषण से क्रोधित होकर ब्रिटिश पुलिस के अफसरों ने मंशाराम तथा उनके क्रांतिकारी साथियों पर आक्रमण कर दिया। पुलिस ने लाठीचार्ज तेज किया तभी क्रांतिकारी युवकों ने पुलिस पर पत्थर फेंके। दण्डाधिकारी पूनम अग्रवाल ने पुलिस को गोली चलाने के आदेश दिये। पुलिस द्वारा गोलियां चलायी गयीं। गोली मंशाराम के सीने में जा लगी। दूसरी गोली उनके सिर में लगी जिससे मंशाराम की मौत हो गयी।
मध्यप्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम में पुरुषों के साथ- साथ महिलाओं ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई का शंखनाद किया और खून की होली खेली। ऐसी ही एक वीरांगना थीं शहीद गौराबाई । वे नरसिंहपुर जिले के चीचली में हुए आंदोलनों की सूत्रधार थीं। मंशाराम की जान बचाने के लिए गौराबाई अंग्रेजों की गोलियों की शिकार हो गई थीं। स्वतंत्रता संग्राम के समय प्रत्यक्षदर्शी बने कुछ लोगों की पीढ़ी के लोग बताते हैं कि उन्होंने पूर्वजों से सुना है कि मंशाराम,गौराबाई और प्रेमचंद कसेरा से अंग्रेजी हुकूमत थरथर्राती थी। उनके द्वारा किए जाने वाले तीव्र आंदोलन अंग्रेजों के लिए अक्सर सिरदर्द बन जाया करते थे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हुए संघर्षो में अपनी विशिष्ट भूमिका के लिये ठाकुर निरंजन सिंह का स्मरण आवश्यक है। देश को आजाद कराने का संकल्प लेकर निरंजन सिंह सीधे ब्रिटिश हुकूमत से टकराते रहे।  ब्रिटिश हुकूमत ने उन पर दो बार ईनाम घोषित किया। वे पाँच बार जेल गए।  इसी तरह सागर जिले में अब्दुल गनी ने रोलेट एक्ट के विरोध में लोगों को खादी वस्त्र पहनने का संदेश देकर शराब से दूर रहने तथा छुआछूत की बुराई को जड़ से खत्म करने के लिए प्रेरित किया। जनमानस को आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए संगठित करने तथा जागृत करने के लिए उन्होंने दोहरी लड़ाई लड़ी। एक तरफ वे विभिन्न आंदोलनों में सक्रीय भूमिका निभाते वहीं दूसरी तरफ पं. सुंदरलाल के दैनिक भविष्य और मूलचन्द्र अग्रवाल के दैनिक विश्वामित्र में ओजस्वी लेखन के माध्यम से जन चेतना जगाते। इन अखबारों में उनके लेख पाठकों में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के लिए प्रेरणा जागृत करते। स्वतंत्रता संग्राम में विभिन्न आंदोलनों के दौरान अब्दुल गनी ग्यारह बार जेल गए। अंग्रेजी हुकुमत के अत्याचारों को उजागर करने वाले लेखों को प्रकाशित करने पर उन्हें मान हानि  के मुकदमों का सामना करना पड़ा था। सागर के रतौना कसाई खाना आंदोलन का उल्लेख अक्सर होता है। सन्् 1920- 21 के दौरान अमेरिका की कम्पनी सेंट डेविडपोर्ट ने विदेशों में डिब्बा बंद गौ मांस निर्यात करने की योजना बनायी थी। कम्पनी ने सागर के समीप रतौना नामक गांव में कसाई खाना खोलने की स्वी.ति ब्रिटिश सरकार से प्राप्त कर ली जिसमें 1400 गायों को प्रतिदिन काटने का लक्ष्य निर्धारित था। रतौना में कसाई खाना खुलने की खबर आग की तरह फैली। इसके खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन का निर्णय लिया गया। सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व अब्दुल गनी को सौंपा गया। गनी अपने साथियों के साथ गांवों में घूमकर कसाई खाने के विरोध में ओजस्वी भाषण देकर लोगों को जागरूक करते। उनकी बातों ने वृहद पैमाने पर लोगों को प्रभावित और प्रेरित किया जिसके परिणामस्वरुप रतौना आंदोलन ने धीरे- धीरे एक व्यापक आंदोलन का रूप धारण कर लिया। लोगों ने तन- मन-धन से इस आंदोलन में गनी साहब को सहयोग दिया। यह आंदोलन इतना व्यापक हो गया कि सरकार को झुकना पड़ा और अंतत: ब्रिटिश सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा। रतौना आंदोलन सागर जिले में अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध जन आंदोलन की प्रथम विजय थी। इस आंदोलन में हिन्दु और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों ने पूर्ण सहयोग दिया।
वह एक अद्भुत युग था। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कुछ भी कहना या लिखना अपराध समझा जाता था। केवल भारत माता की जय बोलने पर ही जेल में डाल दिया जाता  अथवा गोली से उड़ा दिया जाता था। ऐसे ही माहौल में गुना के कुछ क्रांतिकारी युवकों के मन में स्वतंत्रता प्राप्त करने की इच्छा बलवती हुई। उन क्रांतिकारी युवकों की टोली का नेतृत्व किया था सीताराम ताटके ने । गुना के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम ताटके ने अंगेजी हुकूमत के जुल्म सहे। भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहने पर जब वे जेल गए तब अंग्रेजों ने उनके परिवार पर खूब अत्याचार किए। चूंकि ताटके जी के घर अक्सर क्रांतिकारियों का आना जाना था अत: अंग्रेज उनके घर की तलाशी लेते। आंदोलनों में सक्रिय रहने के कारण सीताराम ताटके को कई वर्ष जेल में रहना पड़ा। देश की स्वतंत्रता की चाहत जब हृदय में उत्पन्न हुई तब जेल की सजा, फाँसी का दण्ड और बंदूकों के कुंदों का प्रहार भी आन्नददायक लगने लगा था। उन दिनों तो बस एक ही वाक्य जुबान पर रहता था देश स्वतंत्र हो। मातृभूमि के पैरों में पड़ी दासता की बेड़ियां कटें। 15 अगस्त 1947 को जब स्वाधीनता का अरूणोदय हुआ तब देश ने विदेशी दासता से मुक्ति  पाई। आजादी पाने के लिए जिन वीर योद्धाओं ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया उनमें पंडित ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी प्रमुख थे।  महात्मा गांधी के साथ उन्होंने अनेक आंदोलनों में भाग लिया और कई बार कारावास भोगा। पंडित ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी का जीवन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कवि और निर्भिक पत्रकार की मिली- जुली रेखाओं से बनता है। कारावास के दौरान जेल में लिखी गई उनकी काव्य रचनाएं तथा नाटक खूब चर्चित रहे। अंग्रेजी हुकूमत को हिला देने वाले उनके लेख अखबारों में प्रमुखता से छपते थे। आंदोलन के दौरान दिए जाने वाले उनके ओजस्वी भाषण क्रांतिकारियों में नयी ऊर्जा का संचार करते थे।

 

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