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हिंदी बने जन-जन की भाषा

लेखक- आचार्य प्रशांत 
शिक्षा क्या है? शिक्षा वो है जो बच्चे को जानवर से इंसान बनाए। रोज़गार पाने के लिए अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा जी रही है, ठीक है, रोटी की भाषा अंग्रेज़ी होती है तो होती रहे। लेकिन, हर बच्चे को, हर व्यक्ति को एक दूसरी शिक्षा भी चाहिए। उस शिक्षा का माध्यम हिंदी होनी चाहिए, दूसरी क्षेत्रीय भाषाएँ होनी चाहिए।
अगर आप यह सोचेंगे कि एक ही शिक्षा है, वो जो स्कूल, कॉलेज में दी जा रही है, तो आपको लगेगा, “अरे अरे! अंग्रेज़ी छा गई”। वही भर शिक्षा थोड़े ही है। जो असली शिक्षा है, वह भारत की मिट्टी की भाषाओं में ज़्यादा खूबसूरती से दी जा सकती है। बहुत अंग्रेज़ी पढ़ा-लिखा इंसान होगा हिंदुस्तान में, ऐसा भी होगा जो देवनागरी लिखना ही भूल गया हो, ‘क’ न लिख पाता हो अब, वो भी गाने तो मोहम्मद रफ़ी के ही सुनता है। भारत के एक-से-एक भूरी चमड़ी वाले अंग्रेज हैं, गाली तो वो भी हिंदी में ही देते हैं। तो आप चिंता मत करिए।
कोई भी भाषा अपनी उपयोगिता के आधार पर ही ज़िंदा रहती है। जो भाषा अनुपयोगी हो गई, वो मर जाती है। आप उसको बहुत दिनों तक कृत्रिम तरीकों से, वेंटीलेटर पर ज़िंदा नहीं रख सकते। आप यह नहीं कह सकते, “अरे! अरे! पुरानी भाषा है, ज़िंदा रखो, ज़िंदा रखो”। उपयोगी होगी तो ज़िंदा रहेगी। लोगों के काम की होगी तो ज़िंदा रहेगी।
अंग्रेज़ी का भी आप इतना फैलाव इसीलिए देख रहे हैं क्योंकि उससे लोगों को कुछ लाभ हो रहा है। क्या लाभ हो रहा है? रोज़गार मिल रहा है। हिंदी हो, चाहे तमिल हो, उससे भी अगर लोगों को लाभ होगा, तो ये भाषाएँ खूब फैलेंगी।
आप फिल्में देखने जाते हैं, वो फिल्में दिल को छू जाती हैं न? ये लाभ है न? तो इसीलिए भारत में जो फिल्म इंडस्ट्री है वो दुनिया की फिल्म इंडस्ट्रियों में बड़ी-से-बड़ी है। इसी तरीके से अगर अध्यात्म की भाषा हमारी मिट्टी की भाषाएँ रहेंगी तो लोगों को मजबूर होकर के हिंदी, तमिल, तेलुगू, बंगाली, पंजाबी सीखनी पड़ेंगीं। लोग सीखेंगे। खासतौर पर बंगाल में तो कई उदाहरण रहें हैं जहाँ लोगों ने बंगाली सीखी इसलिए क्योंकि वो बंगाली का कोई उपन्यास पढ़ना चाहते थे। इसी तरीके से चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति का उदहारण है। जब यह छपे तो इतने प्रसिद्ध हुए कि लोगों ने इन पुस्तकों को पढ़ने के लिए भाषा सीखी। अब भाषा की उपयोगिता है न कि तुम्हें यह भाषा आती है तभी तो तुम चद्रकांता पढ़ पाओगे? तो ऐसा कुछ करा तो जाए न हिंदी में कि जो इतना उपयोगी हो कि लोगों को हिंदी की ओर लौटना पड़े या हिंदी सीखनी ही पड़े। हिंदी में कुछ ऐसा होगा तो हिंदी अपने आप आगे बढ़ेगी, सब भाषाएँ बढ़ेंगी।
तो नारे लगाने से कुछ नहीं होगा, हिंदी पखवाड़ा मनाने से कुछ नहीं होगा, बार-बार ये कहने से नहीं होगा कि, “चलो, हिंदी पढ़ें, राष्ट्र भाषा है, कि जन भाषा है, मातृभाषा है”। ये सब बोलने से कुछ नहीं होता। भाषा वही ज़िंदा रहती है जो काम की होती है। कुछ हिंदी में या तमिल में ऐसा करके दिखाइए जो मूल्य का हो, जो वज़न, कीमत का हो, फिर लोग अपने आप हिंदी और तमिल की ओर आकर्षित होंगे।
आप कहें, “नहीं, स्कूलों में अनिवार्य कर दो क्षेत्रीय भाषा और हिंदी,” तो उससे भी क्या होगा? लोग पढ़ लेंगे? उत्तर भारत में संस्कृत अनिवार्य रहती है छठी तक, आठवीं तक, कई बार दसवीं तक, लोग कुछ-कुछ करके संस्कृत का पर्चा पास कर लेते हैं। फिर? संस्कृत क्या उनकी भाषा बन पाती है?
इसी तरीके से आप हिंदी को सब तरफ अनिवार्य भी कर दीजिए, कोई लाभ नहीं होगा जब तक वो भाषा लोगों के, दोहरा रहा हूँ, उपयोग की ना हो, काम की ना हो।
हिंदी के प्रचार में, प्रसार में अभी भी बॉलीवुड का बहुत बड़ा योगदान है। और ये भाषा फैल ही रही है, भारत की लगभग सभी क्षेत्रीय भाषाएँ फैल रही हैं। हालांकि, जो कुछ बहुत छोटी-छोटी भाषाएँ हैं, उन पर खतरा भी है। कुछ बहुत छोटी बोलियाँ, लिपियाँ मिट भी गई हैं। लेकिन फिर भी तक़रीबन जो ज़्यादा प्रचलित भाषाएँ हैं, वो ना सिर्फ बची हुई हैं बल्कि फैल रही हैं—भारत से बाहर भी फैल रही हैं, और उसकी बहुत बड़ी वजह सिनेमा है। वो लोगों के काम का है तो लोग कहते हैं भाषा आनी चाहिए।
हम वो शिक्षा दे रहें हैं लोगों को जो लोगों के काम की है। इस शिक्षा का वाहन हिंदी को रखा है। ये शिक्षा आगे बढ़ेगी, इसका वाहन तो आगे बढ़ेगा ही साथ में।
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