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डूबती कांग्रेस को तिनके की तलाश 

लेखक- सुरेश हिन्दुस्थानी 
वर्तमान में कांग्रेस के राजनीतिक प्रभाव के नकारात्मक रुख को देखकर कोई भी व्यक्ति उसकी तरफ आकर्षित नहीं हो रहा है। तमाम राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस को एक ऐसे डूबते हुए जहाज की संज्ञा दे चुके हैं, जिस पर कोई भी व्यक्ति सवार होने से पहले सौ बार सोचता है।
हालांकि कांग्रेस अपनी डूबती नाव को किनारे पर लाने का गंभीरता से प्रयास करती हुई दिखाई देने लगी है। लेकिन यह प्रयास कांग्रेस में सुधार करने के नहीं कहे जा सकते। यह मात्र सत्ता प्राप्त करने की लालसा ही कही जा सकती है।
अभी हाल ही में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को कांग्रेस में शामिल करने के प्रयास को भी इसी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। अब प्रशांत किशोर की ओर से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि वे अब कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे। ऐसे में सवाल यह भी उठने लगे हैं कि क्या वास्तव में कांग्रेस उस स्थिति में पहुंच चुकी है, जहां से पुनरोदय की आशा समाप्त हो जाती है।
कांग्रेस की वर्तमान स्थिति के बारे में अध्ययन किया जाए तो यही परिलक्षित होता दिखाई देता है कि पार्टी में कोई चमत्कारिक नेता नहीं बचा है। इसलिए कांग्रेस नए प्रकार से सोचने के लिए विवश है। कांग्रेस की डूबती नाव को सहारा देने के लिए चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर पर विश्वास करने के अलावा कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं था।
लेकिन आज कांग्रेस की स्थिति को देखकर उन्हें भी यही लगा होगा कि कांग्रेस फिलहाल इसी स्थिति में रहेगी। वैसे भी उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ प्रशांत किशोर का अनुभव ठीक नहीं रहा। इस चुनाव में कांग्रेस ने प्रशांत किशोर के साथ असफलता का ऐसा चिन्ह स्थापित किया है, जो उनके साथ हमेशा लगा रहेगा।
वास्तव में प्रशांत किशोर का कांग्रेस के साथ नहीं जाना एक प्रकार से उनकी रणनीति का ही हिस्सा है, क्योंकि कांग्रेस का भलीभांति अध्ययन करने के बाद प्रशांत किशोर नहीं चाहते होंगे कि असफलता का एक और टैग उनके साथ चिपक जाए।
कांग्रेस को उबारना प्रशांत किशोर के लिए इसलिए भी टेड़ी खीर है, क्योंकि जब कांग्रेस नेतृत्व ही अपने नेताओं के निशाने पर है, तब प्रशांत किशोर किस आशा के साथ कांग्रेस को उबारने का संकल्प लेने के लिए उतावले दिखाई दिए। आज की कांग्रेस में विसंगति यह है कि हर नेता अपने आपको राष्ट्रीय स्तर का ही मानने की भूल कर बैठा है, वह कांग्रेस को अपने हिसाब से ही चलाना चाहता है।
इसलिए समूह 23 में शामिल नेता अपने आपको कांग्रेस का बड़ा नेता तो मानते हैं, लेकिन अपने नेतृत्व पर निशाना साधने से भी नहीं चूकते। वास्तव में यह विरोधाभास नहीं, बल्कि एक खुली बगावत ही कही जाएगी। कांग्रेस नेताओं के बगावती बयान केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही उठ रहे हैं, ऐसा नहीं है। राज्यों में भी इस प्रकार के तेवर कांग्रेस का संकट बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को सलाह देते हुए कहा कि कांग्रेस को मेरी नहीं, अच्छे नेतृत्व की जरूरत है। इसका आशय यही है कि कांग्रेस इसलिए कमजोर होती जा रही है, क्योंकि उसका नेतृत्व कमजोर है। यही बात समूह 23 के नेता बहुत पहले से कहते रहे हैं, लेकिन कांग्रेस नेता इस पर विचार मंथन करने की बजाय वही करती जा रही है, जो उसके पतन का कारण है।
कांग्रेस का इतिहास रहा है कि जब भी कांग्रेस का नेतृत्व गैर गांधी परिवार के हाथों में रहा है, तब गांधी परिवार कांग्रेस में निर्णायक नहीं रहा। वर्तमान में सोनिया गांधी की कार्यप्रणाली से ऐसा ही लग रहा है कि वे अपने पुत्र राहुल गांधी और पुत्री प्रियंका वाड्रा को किनारे करने की मानसिकता में नहीं हैं। इसलिए नेतृत्व परिवर्तन पर विचार होगा, इस बात की गुंजाइश कम ही है। आज की कांग्रेस की एक बड़ी कमजोरी यह भी है कि वह गांधी परिवार के अलावा किसी को अपना नेता मानने की स्थिति में नहीं है।
क्योंकि बाकी कांग्रेस के नेताओं के अपने अपने समूह हैं। जो एक दूसरे को पसंद नहीं करते। यानी कांग्रेस कई धड़ों में बिखरी हुई दिखाई देगी। फिर कांग्रेस को संभालना और भी ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।
आज कांग्रेस की एक और बड़ी समस्या यह है कि उसके बड़े-बड़े राजनीतिक शूरमा कांग्रेस से किनारा कर चुके हैं और कुछ किनारा करने की सोच रहे हैं। जो कांग्रेसी दूसरे दलों की विचारधारा को आत्मसात कर चुके हैं, वे निश्चित ही कांग्रेस की कमजोरी का कारण ही बनेंगे। पंजाब विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस की अप्रत्याशित पराजय का कारण उसका राज्य नेतृत्व ही रहा।
सरकार और संगठन के मुखिया एक दूसरे के खिलाफ ही अपनी ताकत आजमाते रहे। इसी प्रकार की स्थिति राजस्थान में भी कई बार बनी है और आगे भी बनी रह सकती है। अशोक गहलौत और सचिन पायलट के बीच राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई अब किसी से छिपी नहीं है। अभी हाल ही में जिस प्रकार से सचिन पायलट की सोनिया गांधी से मुलाकात हुई है, उसे अशोक गहलौत पचा नहीं पा रहे।
अशोक गहलौत ने अप्रत्यक्ष रूप से त्याग पत्र देने की धमकी दे दी। इसलिए यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस के अंदर जो लावा सुलग रहा है, वह कभी भी फूट सकता है। इसी प्रकार के हालात गुजरात में भी बनते दिखाई देने लगे हैं। वहां हार्दिक पटेल ने अपने ही प्रादेशिक नेतृत्व पर सवालों की झड़ी लगा दी है।
इसी प्रकार उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की स्थिति पूरी तरह से भंवर में समा गई है। कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तरप्रदेश से होकर जाता है। हालांकि पिछले दो दशकों से यह परिभाषा बदलती हुई दिखाई दी। लेकिन लोकसभा की सीटों के हिसाब से यह परिभाषा आज भी सटीक बैठती है। यानी कांग्रेस को अपनी हालत सुधारनी है तो उसे उत्तर प्रदेश पर ध्यान केन्द्रित करना होगा।
कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में पूर्व में भी कई प्रयोग किए। लेकिन वे सभी प्रयोग फैल होते दिखाई दिए। विरासती पृष्ठभूमि को आधार बनाकर एक चमत्कारिक नेता के रूप में प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मैदान में उतारा, लेकिन वे भी लौट के बुद्धू घर को आए वाली कहावत को चरितार्थ करती हुई दिखाई दीं।
आज कांग्रेस की हालत यह है कि उसे कोई भी दो कौड़ी के भाव नहीं पूछ रहा। अभी हाल ही में राहुल गांधी ने मायावती से गठबंधन के बारे में वार्ता का जिक्र किया, जिसे मायावती ने सिरे से खारिज कर दिया। जिसके बाद कहा जा रहा है कि राहुल गांधी ने इस मामले पर भी झूंठ ही बोला। ऐसी ही राजनीति के कारण कांग्रेस पार्टी अविश्सनीय होती जा रही है।
कांग्रेस जानती है कि उसकी आगे की राह आसान नहीं है, उसे भाजपा के रूप में बहुत बड़ी चुनौती मिल रही है। इस चुनौती को आज की स्थिति में कांग्रेस स्वीकार कर पाने की स्थिति में नहीं है।
क्योंकि भाजपा अपने पत्ते बड़ी सावधानी से खोलती है। कांग्रेस के लिए प्रशांत किशोर ने जो कहा है, उस कांग्रेस अमल करती तो कुछ उम्मीद बन सकती है, अन्यथा की स्थिति में कांग्रेस केवल गांधी और नेहरू परिवार की ही बनकर रह जाएगी। ऐसे में कांग्रेस के बड़े नेता उसका साथ छोड़ सकते हैं।
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