कारगिल युद्ध के निर्णायक मोड़ पर भारतीय सेना के जवानों ने टाइगर हिल और पॉइंट 4875 पर दुश्मन के कब्जे को चूर-चूर कर दिया। 18 ग्रेनेडियर्स और 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स की टुकड़ियों ने हिमालय की दुर्गम चोटियों पर ऐसी बहादुरी दिखाई कि पाकिस्तानी घुसपैठियों की रणनीति ध्वस्त हो गई। इस जीत ने युद्ध की दिशा बदल दी और 26 जुलाई को पूरे कारगिल को दुश्मन से मुक्त कराने का मार्ग प्रशस्त किया।
ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव इस लड़ाई के जीवंत प्रतीक बने। गोली लगने के बावजूद, कई घावों से लहूलुहान होकर भी उन्होंने निकटवर्ती मुकाबले में चार दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और अपने प्लाटून को प्रेरित कर आगे बढ़ाया। वहीं, दिल्ली के एक टैक्सी ड्राइवर के बेटे राइफलमैन संजय कुमार ने अकेले दुश्मन के बंकर पर धावा बोल दिया। निहत्थे हाथों से तीन दुश्मनों को मार गिराकर उन्होंने उनके ही मशीन गन से रास्ता साफ किया। दोनों वीरों को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया जो है भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार।
ये कहानियां सिर्फ व्यक्तिगत शौर्य की नहीं, बल्कि भारतीय सैनिक की अटूट इच्छाशक्ति की हैं। उच्च ऊंचाई, कठोर मौसम और दुश्मन की मजबूत पोजीशन के बावजूद हमारी सेना ने जो कुछ हासिल किया, वह रणनीतिक दूरदर्शिता, नेतृत्व और जज्बे का अद्भुत मेल था।
पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक, जिनकी पुस्तक ‘कारगिल: फ्रॉम सरप्राइज तो विक्ट्री’ इस युद्ध का प्रामाणिक दस्तावेज है, मलिक ने इस पुस्तक के बारे में बताते हुए सोशल मीडिया पर लिखा है- “हर एक पहचानी गई बहादुरी के पीछे युद्ध की धुंध में अनेक ऐसे कार्य छिपे रह जाते हैं जिन्हें कभी सम्मान नहीं मिल पाता।” उन्होंने अपनी पुस्तक उन अनगिनत अज्ञात वीरों को समर्पित की, जिन्होंने अपनी जान गंवाई लेकिन इतिहास के पन्नों में नाम तक नहीं लिखा जा सका।
कारगिल की यह विजय सिर्फ भौगोलिक जीत नहीं थी। यह उस राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक है जो चुनौतियों के सामने कभी झुकता नहीं। आज जब हम सीमाओं पर नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, इन वीरों की कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची ताकत हथियारों में नहीं, बल्कि उन सैनिकों के दिलों में होती है जो मातृभूमि के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहते हैं।


