अटलांटिक महासागर की लहरों पर भारतीय नौसेना का सेल ट्रेनिंग शिप आईएनएस सुदर्शिनी 25 जुलाई को अमेरिका के बोस्टन बंदरगाह से रवाना हो गया। यह यात्रा महज एक नौसैनिक अभियान नहीं, बल्कि भारत की सदियों पुरानी समुद्री विरासत का जीवंत प्रदर्शन है। लोकयान-26 अभियान के अंतर्गत यह जहाज संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के ऐतिहासिक सेल-250 समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुका है।
नॉरफॉक, बाल्टीमोर, न्यूयॉर्क और बोस्टन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक समीक्षा तथा टॉल-शिप परेड में सुदर्शिनी ने तिरंगे को गर्व से फहराया। विभिन्न देशों के नौसैनिक प्रतिनिधिमंडलों, भारतीय प्रवासी समुदाय और गणमान्य व्यक्तियों का स्वागत करते हुए जहाज ने न केवल पेशेवर आदान-प्रदान को मजबूत किया, बल्कि भारत-अमेरिका समुद्री साझेदारी को भी नई ऊर्जा दी। गोवा शिपयार्ड में स्वदेशी तकनीक से निर्मित यह तीन मस्तूल वाला बार्क जहाज आज भी नाविकों को पारंपरिक नौपरिवहन, अनुशासन और साहस का पाठ पढ़ाता है।
अब सुदर्शिनी पुर्तगाल के अज़ोरेस द्वीपसमूह स्थित पोंटा डेलगाडा की ओर अग्रसर है। यह कदम मात्र भौगोलिक यात्रा नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को सागरों तक विस्तार देने का प्रतीक है। एक दशक से अधिक समय से भारतीय नौसेना सागर में उपस्थिति बढ़ाने, सहयोगात्मक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और सांस्कृतिक कूटनीति को आगे बढ़ाने पर बल दे रही है। सुदर्शिनी इसी रणनीति का जीवंत उदाहरण है। इस अभियान से भारत ने विश्व को यह सन्देश भी दिया है कि दुनिया के हर देश से पहले भारत के पास नौसेना हुआ करती थी। यहाँ इस बात का जिक्र करना बेहद जरुरी है कि सम्राट समुद्रगुप्त के पास तीसरी सदी में बहुत ही जबरदस्त नौसेना थी और उनके नौसैनिक अभियानों के बारे में इतिहास में बहुत कुछ लिखा हुआ है।


