लद्दाख के लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना ने लेह में स्व. कर्नल सोनम वांगचुक (रिटायर्ड), महावीर चक्र विजेता के अंतिम संस्कार में पुष्पांजलि अर्पित की। “लद्दाख के शेर” के नाम से प्रसिद्ध इस करगिल युद्ध नायक को पूरे सैन्य सम्मान के साथ विदा दी गई। एलजी ने शोक संतप्त परिवार से मुलाकात कर व्यक्तिगत संवेदनाएं भी जताईं और घोषणा की कि लेह में उनके सम्मान में एक स्मारक बनाया जाएगा। यह श्रद्धांजलि न केवल एक सैनिक के प्रति आभार है, बल्कि उन हजारों अज्ञात वीरों की याद दिलाती है जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
कर्नल सोनम वांगचुक का जन्म 11 मई 1964 को लेह के संकर गांव में हुआ था। 1987 में असम रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त करने के बाद वे लद्दाख स्काउट्स में डेपुट हुए। 1999 के करगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) में मेजर के रूप में उन्होंने बाल्टिक सेक्टर के चोरबट ला पर दुश्मन की घुसपैठ को रोकने का दायित्व संभाला। 28 मई को शुरू हुए इस अभियान में उन्होंने दुर्गम ऊंचाई, कठिन मौसम और भारी गोलीबारी के बीच अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया। चोरबट ला पर पहला सफल ऑपरेशन उनके ही नेतृत्व में हुआ, जिसने बाद के अभियानों की नींव रखी। इस वीरता के लिए उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र प्रदान किया गया।
लद्दाख के इस सपूत ने न केवल युद्ध में अदम्य साहस दिखाया, बल्कि शांति काल में भी सादगी और सेवा भाव से युवाओं को प्रेरित किया। उनकी मृत्यु हृदयाघात से मात्र 61 वर्ष की आयु में हो गई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत सेना और राष्ट्र ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
आज जब सीमाओं पर चुनौतियां बरकरार हैं, कर्नल वांगचुक की गाथा हमें याद दिलाती है कि सच्चा राष्ट्रवाद बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा में निहित है। लद्दाख की रणनीतिक अहमियत को देखते हुए ऐसे वीरों की विरासत को संरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। “रक्षा संवाद” स्तंभ उनके जैसे नायकों को नमन करता है, जिनकी कुर्बानी पर आज हमारा संप्रभु भारत खड़ा है।


