31 जुलाई को नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में थलसेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने एक्सट्रीम वेदर ग्रेड (एक्सडब्ल्यूजी) डीजल का अनावरण किया। भारतीय सेना और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के संयुक्त प्रयास से मात्र एक वर्ष में विकसित यह बीएस-VI अनुरूप ईंधन -42 डिग्री सेल्सियस तक प्रभावी रहता है। यह उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लड़ाकू व रसद वाहनों की गतिशीलता सुनिश्चित करता है, बिना किसी इंजन संशोधन के।
पारंपरिक डीजल अत्यंत ठंड में मोम जैसा जम जाता है, जिससे फिल्टर जाम हो जाते हैं। सैनिकों को रातभर हर दो घंटे वाहन स्टार्ट करने या टैंक के नीचे बुखारी रखने जैसी जोखिम भरी प्रक्रिया अपनानी पड़ती थी। एक्सडब्ल्यूजी ने इन खतरों को समाप्त कर सुरक्षा, मनोबल और परिचालन तत्परता बढ़ाई है। यह आईएस 1460:2025 मानकों के अनुरूप है और मौजूदा बेड़े के साथ पूर्णतः संगत है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना में यह उपलब्धि उल्लेखनीय है। रूस में आर्कटिक ग्रेड डीजल -52 से 65 डिग्री तक कार्य करता है, जबकि यूरोपीय N590 मानक के आर्कटिक वर्ग 4 में -44 डिग्री का लक्ष्य है। स्कैंडिनेवियाई देशों और कनाडा में भी विशेष शीतकालीन ईंधन प्रचलित हैं। भारत का यह स्वदेशी ईंधन न केवल सैन्य जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि लद्दाख, सिक्किम व हिमाचल जैसे क्षेत्रों के नागरिक उपयोग के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में यह कदम रक्षा रसद श्रृंखला को मजबूत बनाता है। आर्मी- इंडस्ट्री पार्टनरशिप का यह मॉडल भविष्य में अन्य विशिष्ट ईंधनों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। उच्च ऊंचाई पर लड़ाई की रणनीति में ईंधन की विश्वसनीयता अब रणनीतिक संपत्ति बन गई है।


