- दशलक्षण पूजा में कहा गया है—
- मन में हो वही वचन, और वचन वही आचरण
- “रंचक दगा”—थोड़ा-सा छल भी बड़ा दुख देता है
- दूध पीती बिल्ली का उदाहरण—लाभ दिखता है, परिणाम नहीं
- आर्जव का अर्थ अपनी कमियां छिपाना नहीं
- आज के जीवन में आर्जव कैसे उतारें?
- सरलता आत्मा का स्वभाव है
- उत्तम आर्जव का सार- कपट से जीवन उलझता है, सरलता से जीवन सुलझता है। धन, प्रतिष्ठा और सुविधा से बड़ी सम्पदा है विश्वास; और विश्वास की नींव है निष्कपटता।
ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म की आराधना की जाती है। ‘आर्जव’ का अर्थ है—सरलता, निष्कपटता और मन-वचन-काय की एकरूपता। जैन दर्शन में आर्जव का आशय केवल सरल व्यवहार से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर के अंतर को समाप्त करने से है। मन में कुछ और, वाणी में कुछ और तथा आचरण में कुछ और होना कुटिलता है; इसके विपरीत मन, वचन और काय की सरलता ही उत्तम आर्जव है। तत्त्वार्थ सूत्र में भी आर्जव को काय, वचन और मन की वक्रता के अभाव के रूप में समझाया गया है। कपट न कीजै कोय—सरलता ही सच्ची सम्पदा
दशलक्षण पूजा में कहा गया है—
कपट न कीजै कोय, चोरन के पुर ना बसै। सरल सुभावी होय, ताके घर बहु सम्पदा॥
इसका भाव है कि छल-कपट से प्राप्त वस्तु या लाभ स्थायी सुख नहीं दे सकता। जिसके स्वभाव में सरलता है, उसके जीवन की वास्तविक सम्पदा केवल धन नहीं, बल्कि विश्वास, शांति, सद्भाव और धर्म है। दशलक्षण पूजा के उपलब्ध पाठ में भी इस पद को उत्तम आर्जव के मूल संदेश के रूप में रखा गया है।
मन में हो वही वचन, और वचन वही आचरण
आर्जव धर्म की सबसे सरल और गहरी परिभाषा पूजा की इन पंक्तियों में मिलती है— उत्तम आर्जव रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी। मन में होय सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सौं करिये॥ अर्थात मन में जो हो, वही वचन में आए और वचन से जो कहा जाए, वही आचरण में दिखाई दे। यही अंतर-बाह्य एकरूपता है। आज के जीवन में इसका महत्व और बढ़ जाता है। हम कई बार किसी के सामने कुछ और कहते हैं, मन में कुछ और रखते हैं और व्यवहार में कुछ और करते हैं। यही दोहरापन धीरे-धीरे विश्वास को समाप्त करता है। आर्जव हमें अपने भीतर झांककर यह पूछना सिखाता है—क्या मेरा मन, मेरी वाणी और मेरा व्यवहार एक ही दिशा में हैं?
“रंचक दगा”—थोड़ा-सा छल भी बड़ा दुख देता है
आर्जव धर्म कहता है कि थोड़ी-सी भी दगा या चालाकी को हल्का नहीं समझना चाहिए।छल से तत्काल लाभ मिल सकता है, लेकिन उससे मन की सरलता नष्ट होती है, संबंधों में अविश्वास पैदा होता है और व्यक्ति स्वयं अपने भीतर असत्य का बोझ लेकर चलता है। जैन आगम-परंपरा में मायाचार और कुटिलता को आत्मिक प्रगति में बाधक माना गया है। इसलिए आर्जव का संदेश है—लाभ कम हो जाए तो चलेगा, लेकिन जीवन से निष्कपटता नहीं जानी चाहिए।
निर्मल दर्पण जैसा हो मन, पूजा में आगे कहा गया है— करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देख निरमल आरसी। मुख करै जैसा लखै तैसा, कपट-प्रीति अंगारसी॥ यहां ‘तिहुं जोग’ अर्थात मन, वचन और काय को निर्मल दर्पण के समान बनाने की प्रेरणा दी गई है। दर्पण जैसा चेहरा होता है, वैसा ही दिखाता है; वह कुछ छिपाता नहीं। इसी तरह आर्जव धर्म चाहता है कि हमारे भीतर भी कोई छिपाव, बनावट या दोहरापन न हो। जैसा सत्य है, वैसा ही उसे स्वीकार करने का साहस हो। कपट से बनी प्रीति को पूजा में अंगारे के समान बताया गया है— वह बाहर से संबंध जैसी दिखाई दे सकती है, लेकिन भीतर ही भीतर दोनों पक्षों को जला सकती है।
छल से लक्ष्मी नहीं, कर्मबंधन बढ़ता है, पूजा की अगली पंक्ति है— नहिं लहै लछमी अधिक छलकरि, कर्म-बन्ध विशेषता। अर्थात छल-कपट करके प्राप्त किया गया अतिरिक्त लाभ अंततः आत्मिक हानि का कारण बन सकता है। जैन दृष्टि में कर्म का बंध केवल बाहरी कार्य से नहीं, बल्कि उसके पीछे के भाव और कषाय से भी जुड़ा है। इसलिए आर्जव का प्रश्न यह नहीं है कि मैंने कितना लाभ कमाया? बल्कि यह है कि उस लाभ को पाने में मेरे भीतर कितनी कपटपूर्ण वृत्ति पैदा हुई?
दूध पीती बिल्ली का उदाहरण—लाभ दिखता है, परिणाम नहीं
पूजा में एक रोचक उदाहरण दिया गया है—,भय त्यागि दूध बिलाव पीवै, आपदा नहिं देखता॥ बिल्ली दूध पीते समय तत्काल मिलने वाले स्वाद और लाभ को देखती है, लेकिन आगे आने वाले संकट को नहीं देखती। इसी प्रकार कपटी व्यक्ति थोड़े से लाभ के लिए छल करते समय उसके दूरगामी परिणामों को भूल सकता है। यह पंक्ति आज के जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक है। क्षणिक लाभ के लिए किया गया छल भविष्य में विश्वास, संबंध, प्रतिष्ठा और आत्मशांति—सबको नुकसान पहुंचा सकता है।
आर्जव का अर्थ अपनी कमियां छिपाना नहीं
सच्ची सरलता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि व्यक्ति अपने दोषों को पहचानने और स्वीकार करने का साहस रखे। जैन साहित्य में आर्जव को अपने दोषों को छिपाने के बजाय सरलता और निष्कपटता से देखने से जोड़ा गया है। अपनी गलती स्वीकार करना व्यक्ति को छोटा नहीं करता। बल्कि कई बार गलती स्वीकार करने की विनम्रता ही चरित्र की वास्तविक मजबूती होती है।
आज के जीवन में आर्जव कैसे उतारें?
उत्तम आर्जव की साधना मंदिर तक सीमित न रहे, इसके लिए आज कुछ छोटे संकल्प लिए जा सकते हैं—
मन से— किसी के प्रति छिपा हुआ छल या दुर्भाव न रखें।
वचन से— जो कहें, सोच-समझकर और सत्य के अनुरूप कहें।
काय से— अपने शब्दों के अनुरूप आचरण करें।
व्यवहार से— दिखावे और दोहरेपन से बचें।
संबंधों में— विश्वास का सम्मान करें और किसी को जानबूझकर भ्रमित न करें।
रात को स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछें—“क्या आज मेरा मन, मेरी वाणी और मेरा व्यवहार एक थे?” यदि उत्तर ‘हां’ की ओर बढ़ रहा है, तो आर्जव की साधना भी भीतर बढ़ रही है।
सरलता आत्मा का स्वभाव है
जैन दृष्टि में आर्जव केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि आत्मा की सरलता की ओर बढ़ने वाली साधना है। एक जैन विद्वत् स्रोत इसे “योगस्यावक्रता आर्जवम्” के आधार पर मन-वचन-काय की सरलता बताता है। वहीं दशलक्षण पूजा में भी कहा गया है—उत्तम आर्जव ऋजुता है, मन वच काय सरलता है। जब कपट घटता है, तो मन का बोझ घटता है। जब दोहरापन समाप्त होता है, तो संबंधों में विश्वास बढ़ता है। और जब भीतर-बाहर की दूरी कम होती है, तो आत्मचिंतन अधिक सहज होता है।
उत्तम आर्जव का सार- कपट से जीवन उलझता है, सरलता से जीवन सुलझता है। धन, प्रतिष्ठा और सुविधा से बड़ी सम्पदा है विश्वास; और विश्वास की नींव है निष्कपटता।
उत्तम आर्जव हमें यह याद दिलाता है— मन में जैसा भाव, वाणी में वैसा सत्य और कर्म में वैसा ही आचरण—यही आर्जव है। दशलक्षण पर्व का तीसरा धर्म हमें बाहर की दुनिया को बदलने से पहले अपने भीतर के छल और कुटिलता को पहचानने की प्रेरणा देता है। जब मन सरल होता है, वाणी निष्कपट होती है और कर्म उसी के अनुरूप होते हैं, तब जीवन में शांति, विश्वास और आत्मिक शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


