ज्योतिषाचार्य श्री विनोद जैन (प्रभु)
इंदौर। दशलक्षण पर्व के चौथे दिन उत्तम सत्य धर्म की आराधना की जाती है। जैन दर्शन में सत्य का अर्थ केवल झूठ से बचना नहीं है। सत्य वह है जो यथार्थ, हितकारी, मर्यादित और अहिंसक वाणी के रूप में प्रकट हो। मन में सत्य का भाव हो, वाणी में उसका प्रकटीकरण हो और व्यवहार में भी उसी सत्य की झलक दिखाई दे—यही उत्तम सत्य धर्म की भावना है।
सत्य को जवाहरात की तरह संभालकर रखें
दशलक्षण पूजा में कहा गया है—कठिन वचन मत बोल, परनिंदा अरु झूठ तज।
सांच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी॥ अर्थात कठोर वचन बोलने से बचें, दूसरों की निंदा और झूठ का त्याग करें। सत्य को हीरे-जवाहरात की तरह मूल्यवान समझकर जीवन में धारण करें। जिस व्यक्ति की वाणी पर लोगों को विश्वास होता है, उसके लिए समाज में सम्मान और संबंधों में स्थिरता बनी रहती है। सत्य बोलना आसान दिखाई देता है, लेकिन परिस्थितियां प्रतिकूल होने पर सत्य के साथ खड़े रहना ही वास्तविक परीक्षा है। लाभ, भय, रिश्ते या स्वार्थ के कारण सत्य को बदल देना उत्तम सत्य धर्म की भावना के विपरीत है।
सत्य हो, लेकिन कटुता नहीं
जैन परंपरा वाणी में सत्य के साथ हित और अहिंसा को भी महत्व देती है। किसी को अपमानित करने, नीचा दिखाने या चोट पहुंचाने के उद्देश्य से कही गई बात केवल इसलिए उत्तम नहीं हो जाती कि वह तथ्यात्मक रूप से सही है। इसलिए बोलने से पहले यह विचार करना चाहिए—क्या यह बात सत्य है? क्या यह हितकारी है? क्या इसे शांत और मधुर ढंग से कहा जा सकता है? उत्तम सत्य का साधक सत्य को हथियार नहीं बनाता, बल्कि उसे आत्मशुद्धि और कल्याण का माध्यम बनाता है।
निंदा भी वाणी की अशुद्धि है
दूसरों की अनुपस्थिति में उनकी बुराई करना, बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए बातें फैलाना भी वाणी की अशुद्धि है। उत्तम सत्य हमें केवल झूठ से ही नहीं, बल्कि निंदा, चुगली और अनावश्यक कठोरता से भी बचने की प्रेरणा देता है। किसी व्यक्ति की कमी बताना आवश्यक हो तो उसमें सुधार का भाव होना चाहिए, अपमान का नहीं। सत्य वही श्रेष्ठ है जो सामने वाले को गिराने के बजाय उसे संभालने का काम करे।
विश्वासघात—सत्य की
कसौटी
दशलक्षण पूजा में कहा गया है—उत्तम सत्य बरत पालीजै, पर-विश्वासघात नहीं कीजै। सत्य का संबंध केवल शब्दों से नहीं, विश्वास से भी है। किसी ने अपना विश्वास रखकर कोई बात बताई और हमने उसका अनुचित लाभ उठाया, झूठा आश्वासन दिया या जानबूझकर उसका विश्वास तोड़ा, तो यह सत्यधर्म की भावना के विपरीत है। इसलिए उत्तम सत्य का अर्थ है—वाणी में सत्य और व्यवहार में विश्वसनीयता। ऐसा जीवन जिसमें व्यक्ति के शब्द और कर्म के बीच दूरी न हो।
राजा वसु की कथा देती है बड़ा संदेश
दशलक्षण पूजा में राजा वसु का प्रसंग सत्य की महत्ता को स्पष्ट करता है। राजा वसु धर्मात्मा और प्रतिष्ठित था। उसके पुण्य और धर्म के कारण उसे ऊंचा स्थान प्राप्त हुआ, लेकिन एक प्रसंग में उसने सत्य से विचलित होकर असत्य का पक्ष लिया। पूजा में इस प्रसंग का भाव आता है—ऊंचे सिंहासन बैठि वसु नृप, धरम का भूपति भया। वच झूठ सेती नरक पहुंचा, सुरग में नारद गया॥ इस कथा का संदेश यह है कि सत्य के मामले में छोटा-बड़ा कोई भेद नहीं होता। असत्य का समर्थन, चाहे वह किसी दबाव, स्वार्थ या परिस्थिति में क्यों न किया जाए, व्यक्ति के कर्म और आध्यात्मिक जीवन को प्रभावित कर सकता है। इसके विपरीत सत्य के पक्ष में खड़ा होना आत्मबल और धर्मनिष्ठा का परिचायक है।
अपने भी गलत हों तो सत्य का साथ
पूजा की पंक्तियों में यह भाव भी मिलता है कि सच्चे और झूठे मनुष्य की पहचान करते समय अपनेपन के कारण पक्षपात नहीं करना चाहिए। यदि अपना व्यक्ति भी गलत है तो उसके गलत कार्य को सही ठहराना सत्यधर्म नहीं है। सत्य की वास्तविक प्रतिष्ठा तभी होती है, जब वह अपने और पराए दोनों के लिए समान हो। रिश्ते प्रेम से निभाए जाएं, लेकिन सत्य और न्याय की कीमत पर नहीं।
आज के जीवन में उत्तम सत्य
आज के जीवन में उत्तम सत्य की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर बिना जांचे खबर आगे बढ़ाना, किसी के बारे में अपुष्ट बात फैलाना, व्यापार में गलत जानकारी देना, झूठे वादे करना या अपने लाभ के लिए तथ्य छिपाना—ये सभी ऐसी परिस्थितियां हैं जहां सत्य की परीक्षा होती है। उत्तम सत्य हमें सिखाता है कि जो बात स्वयं सत्यापित न हो, उसे आगे न बढ़ाएं; जो वादा पूरा न कर सकें, उसे करने से बचें; और जो बात कहें, उसे अपने आचरण से प्रमाणित भी करें।
मन, वाणी और व्यवहार में एकरूपता
सत्य का सबसे सुंदर रूप तब सामने आता है जब व्यक्ति के मन में जैसा भाव हो, वाणी में वैसा ही सत्य और कर्म में वैसा ही आचरण दिखाई दे। बाहर कुछ और और भीतर कुछ और—यह सत्यधर्म की भावना नहीं है। विश्वास उसी व्यक्ति पर टिकता है जिसकी बात और व्यवहार में समानता होती है। इसलिए उत्तम सत्य केवल बोलने का धर्म नहीं, बल्कि पूरे व्यक्तित्व को सत्यनिष्ठ बनाने की साधना है।
सत्य की सबसे बड़ी पूंजी—विश्वास
धन-संपत्ति समय के साथ कम या अधिक हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा अर्जित विश्वास उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। सत्यवादी व्यक्ति की बात में वजन होता है, उसके संबंधों में मजबूती होती है और समाज में उसकी प्रतिष्ठा बनी रहती है। उत्तम सत्य हमें यही स्मरण कराता है कि सत्य को परिस्थितियों के अनुसार बदलना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के बीच भी सत्य के साथ खड़े रहना ही धर्म है।
उत्तम सत्य धर्म का संकल्प, ॐ ह्रीं श्री उत्तमसत्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तम सत्य का संदेश स्पष्ट है— झूठ से बचें, निंदा छोड़ें, कठोर वाणी का त्याग करें, किसी के विश्वास को न तोड़ें और सत्य को करुणा के साथ जीवन में उतारें। सत्य केवल शब्द नहीं, चरित्र की पहचान है।जहां सत्य है, वहां विश्वास है; जहां विश्वास है, वहां संबंधों में मजबूती और जीवन में शांति है।


