रक्षा क्षेत्र में शक्ति केवल हथियारों, सैनिक संख्या या तकनीकी श्रेष्ठता से तय नहीं होती। युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोर्चा सैनिकों और समाज के मनोबल का भी है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के जवानों का लगभग 18,000 फीट की ऊंचाई पर योग करते हुए सामने आया वीडियो इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह केवल शारीरिक दक्षता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि कठिनतम परिस्थितियों में भारतीय जवानों की मानसिक दृढ़ता और अनुशासन का सार्वजनिक संदेश भी है।
हिमालयी सीमाओं पर चीन की सैन्य गतिविधियों और उसके आधिकारिक प्रचार तंत्र पर भारत लंबे समय से नजर रखता आया है। चीन द्वारा बर्फीले क्षेत्रों में सैनिकों के मार्शल आर्ट या अत्यधिक प्रतिकूल मौसम में प्रशिक्षण से जुड़े वीडियो जारी करना उसकी सैन्य क्षमता और सहनशीलता की छवि प्रस्तुत करने की रणनीति का हिस्सा रहा है। हालांकि यह बात भी समय समय पर सामने आती रहती है कि चीन के वे वीडियो ‘फर्जी’ या ‘डॉक्टर्ड’ साबित हुए हैं। इसी से समझ में आता है कि चीन ने ये पूरी एक्सरसाइज क्यों की होगी? जाहिर है कि भारत, ताइवान, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कम्बोडिया, विएतनाम आदि देशों में अपनी सेना के प्रति मनोवैज्ञानिक डर दिखाना ही उनका मुख्य उद्देश्य रहता है।
यहीं भारतीय प्रतिक्रिया का महत्व बढ़ जाता है। 18,000 फीट जैसी ऊंचाई पर योग का वास्तविक दृश्य भारतीय सैनिकों की परिचालन परिस्थितियों, प्रशिक्षण और मानसिक संतुलन को रेखांकित करता है। यह संदेश प्रत्यक्ष है, हिमालय में तैनात भारतीय जवान केवल मौसम की चुनौती नहीं झेलते, बल्कि कठिन वातावरण में भी संयम और आत्मविश्वास बनाए रखते हैं।
इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध या सूचना-युद्ध के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना अधिक उपयुक्त होगा। आधुनिक संघर्षों में धारणा (perception) स्वयं एक रणनीतिक संसाधन बन चुकी है। विरोधी की क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना या अपनी दृढ़ता का प्रभावी प्रदर्शन करना मनोबल और जनमत को प्रभावित कर सकता है।
चीन के ख्यात विचारक ‘सन त्ज़ू’ ने युद्ध में शत्रु की मानसिक स्थिति और धारणा के महत्व पर बल दिया था। आज डिजिटल युग में वही सिद्धांत वीडियो, सोशल मीडिया और सूचना अभियानों के माध्यम से नए रूप में दिखाई देता है। इसलिए ITBP का यह दृश्य एक सरल संदेश देता है, सीमा की रक्षा केवल भौतिक मोर्चे पर नहीं, बल्कि धारणा और मनोबल के मोर्चे पर भी होती है।


