जापानी नौसेना के विध्वंसक पोत जेएस ताकानामी का 23 से 25 जून तक हुआ श्रीविजयपुरम का दौरा भारत-जापान रक्षा सहयोग की मजबूती का प्रतीक बन गया है। अंडमान-निकोबार कमान (एएनसी) की रणनीतिक अहमियत को रेखांकित करते हुए यह यात्रा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के प्रति दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।
पोत के कमांडिंग अधिकारी तथा जापानी रक्षा अटैचि कैप्टन नकानिशी रयोता ने अंडमान-निकोबार कमान के नौसेना घटक कमांडर से शिष्टाचार भेंट की। दोनों पक्षों ने स्मारक चिन्हों का आदान-प्रदान किया, जो द्विपक्षीय साझेदारी की गहराई का प्रतीक है। जापानी चालक दल ने गांधी पार्क स्थित ऐतिहासिक जापानी मंदिर में श्रद्धांजलि अर्पित की, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी कब्जे की याद दिलाता है और दोनों राष्ट्रों के बीच सांस्कृतिक-ऐतिहासिक संबंधों को जीवंत रखता है।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत की समुद्री रणनीति का आधार स्तंभ है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित ये द्वीप समूह विश्व की सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक धारियों (SLOCs) की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक ये द्वीप भारत की पूर्व दिशा नीति (Act East Policy) और क्वाड फ्रेमवर्क में रणनीतिक गहराई प्रदान करते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी सेना द्वारा कब्जा और बाद में मुक्ति संघर्ष ने इन द्वीपों को ऐतिहासिक महत्व भी दिया है।
हाल के वर्षों में भारत इन द्वीपों को मजबूत बना रहा है
अंडमान-निकोबार कमान की स्थापना (2001) के बाद बुनियादी ढांचे का विकास, नौसैनिक अड्डों का आधुनिकीकरण और निगरानी क्षमताओं में वृद्धि जारी है। ग्रेट निकोबार परियोजना (लगभग 9 अरब डॉलर) एक प्रमुख कदम है, जिसमें ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, पावर प्लांट और स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास शामिल है। यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देगी, साथ ही पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी कल्याण को प्राथमिकता देगी। जापान के साथ सहयोग, जिसमें स्मार्ट आइलैंड्स परियोजनाएं भी शामिल हैं, इन प्रयासों को नई दिशा प्रदान कर रहा है।
यह दौरा केवल सौहार्द का प्रदर्शन नहीं, बल्कि बढ़ते भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भारत-जापान की साझा दृष्टि का प्रमाण है। दोनों देशों का यह साझा प्रयास हिंद-प्रशांत को मुक्त, खुला और नियम-आधारित बनाए रखने में योगदान देगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे सहयोग से भारत की समुद्री शक्ति प्रक्षेपण क्षमता और क्षेत्रीय संतुलन मजबूत होगा।


