हिमालयी सीमाओं पर युद्ध केवल हथियारों और सैनिकों की संख्या का सवाल नहीं है। यहां भूगोल स्वयं एक चुनौती है। अत्यधिक ऊंचाई, कम ऑक्सीजन, कठिन मौसम, दुर्गम रास्ते और सीमित रसद, इन सबके बीच सैन्य क्षमता की वास्तविक परीक्षा होती है। इसी संदर्भ में पूर्वी कमान के तत्वावधान में त्रिशक्ति कोर द्वारा उत्तरी सिक्किम के सुपर हाई-एल्टीट्यूड क्षेत्र में किया गया सैन्य अभ्यास रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
भारतीय सेना के अनुसार, अभ्यास का उद्देश्य अत्यंत कठिन भूभाग और परिस्थितियों में सैनिकों तथा सैन्य उपकरणों की क्षमता को परखना था। विभिन्न हथियारों और सेवाओं के बीच निर्बाध तालमेल तथा उपकरणों के प्रभावी प्रबंधन ने अभ्यास को सफल बनाया। यह संदेश महत्वपूर्ण है कि ऊंचाई वाले मोर्चे पर केवल व्यक्तिगत सैनिक का साहस पर्याप्त नहीं; सिस्टम की सामूहिक दक्षता ही युद्धक क्षमता को निर्णायक बनाती है।
सिक्किम का सामरिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह क्षेत्र भारत-चीन सीमा और संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर से जुड़े व्यापक पूर्वी सैन्य क्षेत्र का हिस्सा है। त्रिशक्ति कोर पहले भी यहां उच्च ऊंचाई पर लाइव-फायर और मिसाइल अभ्यासों के जरिए अपनी त्वरित तैनाती, सटीक मारक क्षमता और कठिन पर्वतीय भूभाग में संचालन की तैयारी प्रदर्शित कर चुका है।
इस नवीनतम अभ्यास की सबसे बड़ी सीख अनुकूलन क्षमता है। भविष्य का पर्वतीय युद्ध लंबे समय तक स्थिर मोर्चों तक सीमित नहीं रहेगा। ड्रोन, सटीक हथियार, निगरानी प्रणालियां और तेज रसद-श्रृंखला सैनिकों की प्रभावशीलता को निर्धारित करेंगे। हाल में सेना द्वारा उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रसद ड्रोन की क्षमता बढ़ाने की पहल भी इसी बदलती आवश्यकता को रेखांकित करती है।
त्रिशक्ति कोर का अभ्यास इसलिए केवल प्रशिक्षण गतिविधि नहीं, बल्कि स्पष्ट रणनीतिक संकेत है, हिमालय में विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता का आधार कठिन परिस्थितियों में लगातार अभ्यास, संयुक्त कार्रवाई और उपकरणों की निर्बाध उपलब्धता है। ऊंची चोटियों पर युद्ध की तैयारी, अंततः मैदान में युद्ध टालने की क्षमता को भी मजबूत करती है।


