फायर एंड फ्यूरी कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग और सभी रैंकों ने सियाचिन ग्लेशियर पर कर्तव्य पथ पर शहीद सिपाही सरबजीत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके अटूट साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति निस्वार्थ समर्पण को देश हमेशा याद रखेगा। शहीद की पत्नी, बच्चों और पूरे परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए सेना ने एकजुटता का संदेश दिया। यह घटना एक बार फिर हमें दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र की कठोर वास्तविकता और भारतीय सेना की अजेय भावना की याद दिलाती है।
सियाचिन ग्लेशियर, कराकोरम पर्वत श्रृंखला में 76 किलोमीटर लंबा और औसतन 5,400 मीटर से अधिक ऊंचाई वाला क्षेत्र, प्रकृति की सबसे क्रूर परीक्षा है। यहां तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, तेज हवाएं, भारी बर्फबारी और बार-बार होने वाले हिमस्खलन सैनिकों के लिए घातक साबित होते हैं। ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक ठंड से होने वाली फ्रॉस्ट बाइट तथा हाई एल्टीट्यूड सिकनेस जैसी समस्याएं आम हैं। फिर भी भारतीय जवान यहां सालों से डटे हुए हैं।
सियाचिन का इतिहास 1984 के ऑपरेशन मेघदूत से जुड़ा है। पाकिस्तान की घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम करते हुए भारतीय सेना ने इस रणनीतिक महत्वपूर्ण क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया। तब से आज तक यह ‘विश्व का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र’ बना हुआ है। 1949 के कराची समझौते में इस क्षेत्र को अनिर्धारित छोड़ दिया गया था, जिसका फायदा उठाने की पाकिस्तानी कोशिशों को भारत ने मजबूती से रोका।
रणनीतिक दृष्टि से सियाचिन भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा की रक्षा का अभिन्न अंग है। यह ग्लेशियर सल्टोरो रिज के साथ मिलकर श्योक और नुब्रा घाटियों की सुरक्षा करता है और लद्दाख की दिशा में किसी भी आक्रामक कार्रवाई को रोकता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की संवेदनशीलता को देखते हुए इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत की क्षेत्रीय अखंडता और ऊंचाई लाभ दोनों सुनिश्चित करता है।
शहीद सिपाही सरबजीत सिंह का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। यह उन हजारों जवानों की याद दिलाता है जो बिना किसी हिचक के ‘राष्ट्र प्रथम’ के मंत्र पर जीते और मरते हैं। राष्ट्र इन वीरों का ऋण कभी नहीं चुका सकता, लेकिन उनकी याद में सीमा पर अटल सुरक्षा और स्वाभिमान की प्रतिबद्धता ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।


