15 सप्ताह के तीव्र संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच जेनेवा में 19 जून 2026 को होने वाले समझौते ने पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को नया मोड़ दिया है। यह संधि न केवल हार्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और ईरानी बंदरगाहों पर लगे अमेरिकी नाकेबंदी को समाप्त करने का प्रावधान करती है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।
समझौते का मसौदा तत्काल युद्धविराम, कुछ प्रतिबंधों में निलंबन, ईरान के लगभग 25 अरब डॉलर के फ्रोजन एसेट्स की चरणबद्ध रिहाई और अगले 60 दिनों में परमाणु कार्यक्रम पर व्यापक वार्ता का प्रावधान करता है। ईरान के लिए यह व्यवस्था आर्थिक राहत और शासन की निरंतरता सुनिश्चित करती है। 2018 में JCPOA से अमेरिका के हटने के बाद लगे प्रतिबंधों ने तेहरान को भारी आर्थिक दबाव में डाला था। अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में पुनः एकीकरण का अवसर मिल रहा है।
हालांकि, यह कोई एकतरफा विजय नहीं है। ईरान की सैन्य क्षमता क्षतिग्रस्त हुई है, तेल निर्यात बाधित रहा और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा। इजरायल की ओर से दक्षिणी लेबनान में निरंतर सैन्य उपस्थिति और बेरूत पर हमले इस समझौते की सीमाओं को उजागर करते हैं। इजरायली रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज का बयान स्पष्ट करता है कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में कोई निर्णायक बदलाव नहीं आया है।
ट्रंप प्रशासन इसे परमाणु हथियार रोकने और लंबे युद्ध से बचने की कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा लाभ हार्मुज की बहाली है, जहां से विश्व का बड़ा तेल निर्यात गुजरता है। तेल कीमतों में तीन महीने के निचले स्तर पर गिरावट इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
भारत के लिए निहितार्थ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हम 80 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल का आयात करते हैं। हार्मुज की अस्थिरता मुद्रास्फीति, शिपिंग लागत और आर्थिक विकास को सीधे प्रभावित करती है। यह संकट ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और पश्चिम एशिया में संतुलित संबंधों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। रणनीतिक स्वायत्तता की हमारी नीति एक बार फिर प्रासंगिक सिद्ध हुई है।
यह समझौता विजेता-पराजित का द्वंद्व नहीं, बल्कि परस्पर विवशताओं का परिणाम है। इसकी सफलता निर्भर करेगी सभी पक्षों की प्रतिबद्धता पर। अंतर्निहित जोखिम, परमाणु कार्यक्रम, नौवहन सुरक्षा, बने हुए हैं। दीर्घकालिक स्थिरता के लिए निरंतर कूटनीतिक प्रयास ही एकमात्र विकल्प हैं।


