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क्या है स्वस्तिक चिह्न का शाब्दिक अर्थ? जानें इसके प्रकार और होने वाले लाभ

सनातन धर्म में देवी देवताओं के अलावा कई ऐसे चिह्न भी हैं, जिन्हें पूजा जाता है. इसके अलावा इन चिह्नों को पूजा या मांगलिक कार्य से पहले बनाने का विधान प्राचीन काल से ही चला आ रहा है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चिह्न ब्रह्मज्ञान के गूढ़ रहस्यों को संजोए हुए हैं. उसी के अनुरूप इस चिह्न की विलक्षणता भी है. साधारण से प्रतीत होने वाले स्वस्तिक पर ध्यान केन्द्रित किया जाए तो यह मनुष्य को परमोच्च स्थिति पर पहुंचा सकता है.

स्वस्तिक का शाब्दिक अर्थ
स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से मिलककर बना है.
‘सु’ का अर्थ अच्छा,
‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है. इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला.

इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है.

‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है-
‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात ‘कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है.

कैसा होता है स्वस्तिक चिह्न
स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएं होती हैं. जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं.
इसके बाद भी ये रेखाएं अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं.

कितने प्रकार का होता है स्वस्तिक
स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है.
1. प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएं आगे की तरफ इंगित करती हुई हमारे दायीं तरफ मुड़ती हैं. इसे ‘स्वस्तिक’ कहते हैं. यही शुभ चिह्न है, जो हमारी प्रगति की तरफ संकेत करता है.

2. दूसरी आकृति में रेखाएं पीछे की तरफ संकेत करती हुई हमारे बायीं तरफ मुड़ती हैं. इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं. भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है. जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था.

सूर्य का प्रतीक माना जाता है स्वस्तिक
ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है. सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है. उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है.

मंगल प्रतीक चिह्न
अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल प्रतीक माना जाता रहा है. विघ्नहर्ता गणेश की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ भी शुभ लाभ, स्वस्तिक और बही-खाते की पूजा की परम्परा है.

इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है, इसलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वस्तिक को ही अंकित किया जाता है.

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