मणिपुर में सुलगती नई चिंगारी और राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियाँ

Dr Rajesh Jauhri
By
drrajesh
Dr Rajesh Jauhri is a Journalist with experience of 25 years in Indian and foreign media, Social Scientist, Accomplished Author, Political & Strategic Analyst, Rifle &...
3 Min Read

मणिपुर, जो पिछले तीन वर्षों से जातीय संघर्ष की आग में झुलस रहा है, आज एक बार फिर रक्तपात का गवाह बना। उखरुल जिले के मुलम गांव में कुकी और नागा समुदायों के बीच भड़की ताजा हिंसा ने राज्य के सुरक्षा परिदृश्य को और अधिक जटिल बना दिया है। तड़के करीब 1 बजे हुई इस झड़प में तीन लोगों की जान चली गई, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मणिपुर की समस्या केवल दो समुदायों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब यह बहुआयामी सुरक्षा संकट का रूप ले चुकी है।

उखरुल की यह घटना इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि अब तक यह क्षेत्र अपेक्षाकृत शांत माना जा रहा था। कुकी और तांगखुल नागा समूहों के बीच उपजा यह ताजा विवाद भूमि और वर्चस्व की पुरानी रंजिशों को हवा दे रहा है। कुकी ग्रामीणों का आरोप है कि नागा उग्रवादियों ने बिना उकसावे के हमला कर 15 घरों को राख कर दिया और दो स्वयंसेवकों, लेतलात सितलहौ और पाओमिनलुन हाओलाई की हत्या कर दी, वहीं, नागा नेतृत्व का दावा है कि उनके ग्राम प्रहरी होरशोकमी जामांग की हत्या कुकी उग्रवादियों द्वारा घात लगाकर की गई।

‘रक्षा संवाद’ के नजरिए से देखें तो यह केवल एक कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके गहरे राष्ट्रीय सुरक्षा निहितार्थ हैं:

  • सीमा सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप

मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगती है। आंतरिक अस्थिरता का लाभ उठाकर सीमा पार से उग्रवादी गुट सक्रिय हो सकते हैं, जिससे भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को गंभीर क्षति पहुँच सकती है।

  • हथियारों का प्रसार

2023 से जारी हिंसा के दौरान लूटे गए अत्याधुनिक हथियारों का समुदायों के बीच वितरण एक ‘सशस्त्र समाज’ की स्थिति पैदा कर रहा है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक है।

  • सुरक्षा बलों की चुनौती

सेना और अर्धसैनिक बलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती नागरिकों की सुरक्षा और उग्रवाद विरोधी अभियानों के बीच संतुलन बनाना है। समुदायों के बीच गहराता अविश्वास सुरक्षा बलों के इंटेलिजेंस नेटवर्क को भी बाधित कर रहा है।

उखरुल की आग अगर समय रहते नहीं बुझाई गई, तो यह नागा-कुकी संघर्ष के एक नए दौर को जन्म दे सकती है, जिससे पूर्वोत्तर भारत की अखंडता और स्थिरता दांव पर लग जाएगी। केंद्र और राज्य सरकार को अब ‘फायर फाइटिंग’ मोड से बाहर निकलकर एक व्यापक राजनीतिक समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। शांति केवल बंदूकों के साये में नहीं, बल्कि संवाद और न्याय के धरातल पर ही स्थापित की जा सकती है।

Share This Article
Follow:
Dr Rajesh Jauhri is a Journalist with experience of 25 years in Indian and foreign media, Social Scientist, Accomplished Author, Political & Strategic Analyst, Rifle & Pistol Shooter, Orator, Thinker and Educationist. He holds Ph.D. degree on “Impact of colonial heritage on Indian police”. He is a national-level sportsperson, won titles in badminton, rifle and pistol shooting and at state-level in archery. Runs NGO for social, economic uplift of tribal communities in MP and two decades back, established a school in Kodariya village of Indore to provide education and moral values to children belonging to tribal, minority families