भारत ने एक बार फिर अपनी बदलती वैश्विक भूमिका का प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए उज़्बेकिस्तान की सेना के लिए एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा किया है। कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग, पुणे में 27 मार्च से शुरू हुआ ये प्रशिक्षण कल संपन्न हो गया। इस प्रशिक्षण का केंद्र बिंदु था, आधुनिक युद्ध के सबसे जटिल खतरों में से एक, इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) का मुकाबला।
यह कार्यक्रम भारत-उज़्बेकिस्तान वार्षिक रक्षा सहयोग योजना के तहत आयोजित किया गया, जिसमें उज़्बेक इंजीनियर कोर के अधिकारी और सार्जेंट शामिल हुए। “ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स” मॉडल पर आधारित इस पहल का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक क्षमता निर्माण सुनिश्चित करना है, ताकि प्रशिक्षित सैनिक अपने देश में इस ज्ञान का विस्तार कर सकें।
इस सहयोग का एक ऐतिहासिक आयाम भी है। बाबर और तैमूर लंग जैसे आक्रांताओं ने कभी भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक विनाश किया था। आज उसी उज़्बेकिस्तान भू-भाग से जुड़े सैनिक भारत में प्रशिक्षण ले रहे हैं, यह बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और भारत की बढ़ती सामरिक स्वीकार्यता का प्रतीक है। भारत की विशेषता है ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ वाला विचार सम्पूर्ण प्रशिक्षण के दौरान उज़्बेकिस्तान के सैनिकों व अधिकारियों को यही बात देखने को मिली, जिससे भारत के लिए उनके मन में काफी सम्मान भर गया।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को IED की पहचान, खोज, निष्क्रियकरण और ‘रेंडर सेफ’ प्रक्रियाओं की गहन जानकारी दी गई। साथ ही रोबोटिक्स और स्वायत्त प्रणालियों जैसे अत्याधुनिक उपकरणों का व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान किया गया, जो विस्फोटक निष्क्रियकरण अभियानों में जोखिम को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
तकनीकी प्रशिक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों ने दोनों देशों के बीच विश्वास और समझ को और मजबूत किया। यह पहल स्पष्ट संकेत देती है कि भारत न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में उभर रहा है, जो सहयोग, क्षमता निर्माण और साझा सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित है।


