कल मणिपुर के उखरुल जिले में नेशनल हाईवे 202 पर नुंगशांग कोंग गांव के निकट असम राइफल्स की 40वीं बटालियन के काफिले पर आतंकवादियों ने भीषण घात लगाया। आईईडी विस्फोट के बाद लगभग दो घंटे तक गोलीबारी चली। सुरक्षा बलों ने तुरंत मुंहतोड़ जवाब दिया, मोर्टार और राइफलों से लक्षित कार्रवाई की। तलाशी अभियान में एक अनविस्फोटित आईईडी भी बरामद हुआ। इस हमले में दो जवान शहीद हो गए।
असम राइफल्स के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेरा, राज्यपाल अजय कुमार भल्ला, मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह और गृह मंत्री गोविंदास कोंथौजम ने हमले की कड़ी निंदा की और सख्त कार्रवाई का संकल्प लिया। एनएससीएन (आईएम) ने अपनी संलिप्तता से इनकार किया है, हालांकि शुरुआती सूत्र इस संगठन की ओर इशारा कर रहे हैं। यह संगठन नगालैंड में सुरक्षा बलों के साथ समन्वय का इतिहास रखता है, जिससे घटना और भी जटिल हो जाती है।
यह हमला मणिपुर की सतत जातीय तनाव और नगा प्रभाव वाले क्षेत्र की अस्थिरता को रेखांकित करता है। कश्मीर की तरह पूर्वोत्तर, खासकर नगालैंड और मणिपुर, 1947 से पहले से ही हिंसा की चपेट में रहा है। यहां भी भारी सैन्य तैनाती है और कई इलाके अफस्पा के अंतर्गत आते हैं। फिर भी शांति स्थापना की कोशिशें बार-बार चुनौतियों का सामना करती हैं।
रणनीतिक दृष्टि से यह घटना कई सबक देती है। पहला, खुफिया तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है, खासकर हाईवे और संवेदनशील मार्गों पर। दूसरा, स्थानीय समुदायों के साथ विश्वास निर्माण और शांति वार्ताओं को नई गति देना चाहिए। तीसरा, राज्य सरकार और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक संवेदनशीलता, अंतरराष्ट्रीय सीमा और आंतरिक कलह को देखते हुए सुरक्षा नीति में निरंतर अनुकूलन जरूरी है।
‘रक्षा समवाद’ के पाठकों को याद दिलाना चाहता हूं कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। पूर्वोत्तर की शांति पूरे देश की अखंडता और विकास की कुंजी है। सैन्य बलों के अदम्य साहस के साथ-साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सद्भाव से ही इस क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। हम शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं और आशा करते हैं कि दोषियों पर जल्द कार्रवाई होगी।


